हम एक दूसरे से ज्यादा बातें नहीं कर पाए थे क्योंकि वहाँ ट्रेनिंग में दिनचर्या काफी व्यस्त थी, और लोग ज्यादा, तो हर किसी से ज्यादा बातें होना संभव नहीं था. उस दिन उनके राज्य का सांस्कृतिक प्रदर्शन था. वो भरतनाट्यम करने वाली थी. लेकिन उसके पास ज्यादा गहने नहीं थे जो डांस के लिए पहने जा सकें. तो मैंने और मेरी एक मराठी दोस्त ने उसे अपने गहने देने का प्रस्ताव रखा. वो खुश हो गई. उसने शानदार प्रदर्शन किया था.
उसी दिन रात को वो हमारे हॉस्टल के कमरे में आई. उसके हाथ में दो बालियां थीं हम दोनों के लिए. कृतज्ञता जताने के लिए. वो एकदम सीधी साधी सी थी. विद्वान् तो थी बहुत पर दिल से एकदम साफ़. हमें बालियां देकर वो हमारे चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी. हम लोग ऐसी बड़ी और चमकीली बालियां नहीं पहनते पर उसके चेहरे के भाव देख कर मैंने इतनी ख़ुशी जताई, और उनकी तारीफ़ की उसके चेहरे पर राहत उमटी की चलो मेरा तोहफा इन्हें पसंद आया. वही मेरे लिए बड़ी बात थी. मेरी दोस्त ने उन बालियों को पहनने में अनिच्छा जताई. मैंने उसे समझाया की यहाँ हमें कोई नहीं जानता , अगर उसकी ख़ुशी के लिए हम कुछ देर पहन लेंगे तो उसे अच्छा लगेगा. और मैंने किसी के कुछ कहने की फ़िक्र किये बिना दूसरे दिन उन्हें पहना.
वो खुश थी. उसने हमारी भी काफी मदद की हमारे प्रेजेंटेशन के लिए. असल में उसे गहनों का बहुत शौक था और कपड़ों का भी. हमने उसकी खरीदारी भी करवाई क्योंकि उसे हिंदी नहीं आती थी, तो उसे दिल्ली में खरीदारी करने के लिए किसीकी मदद की जरूरत थी. उसे मेरी पायल बहुत पसंद थी. और मैंने तब से सोच रखा है की अगली किसी प्रदर्शनी में मैं उसके लिए भी वैसी ही पायल ढूंढूंगी. लेकिन अभी तक मिली ही नहीं. और अब ये खबर मिली कि उस पायल को पहनने वाली ही नहीं रही अब इस दुनिया में. वो रानी थी. एकदम दिलदार और साफ़ दिल भी.. सिर्फ ३ हफ्ते हम साथ थे लेकिन आज भी कुछ यादें जहन में रह गेन. उसकी आँखों की चमक, उसके चेहरे की वो मुस्कान, और उसका प्यार से बात करना किसीसे भुलाया नहीं जायेगा. ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दें.

